रांची का पहाड़ी मंदिर: जहां भोलेनाथ के साथ लहराता है तिरंगा, जानें 4500 साल पुराने इतिहास का रहस्य

Pahadi Mandir History: सावन में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना रांची का प्रसिद्ध पहाड़ी मंदिर। जानें इस मंदिर का अनोखा इतिहास, तिरंगा फहराने की परंपरा, 4500 साल पुराने पहाड़ का रहस्य और भोलेनाथ के चमत्कार की पूरी कहानी।

रांची का पहाड़ी मंदिर: जहां भोलेनाथ के साथ लहराता है तिरंगा, जानें 4500 साल पुराने इतिहास का रहस्य

Updated Dec 30 2024 10:01 AM

Editor: Panthalassa Team | Location: Ranchi, Jharkhand, India

झारखंड की राजधानी रांची के बीचों-बीच रातू रोड क्षेत्र में समुद्र तल से लगभग 2,140 फीट और जमीन से लगभग 355 फीट की ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी मंदिर न सिर्फ अपनी शिव भक्ति के लिए बल्कि राष्ट्र भक्ति के लिए भी पूरे देश में मशहूर है. रांची का पहाड़ी मंदिर देश का पहला ऐसा मंदिर है, जहां स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के दिन तिरंगा झंडा फहराया जाता है. यह पहला मंदिर है, जहां धार्मिक झंडे के साथ-साथ देश का तिरंगा झंडा भी लहराता है.

लगभग 465 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़कर भक्त बाबा भोलेनाथ के दर्शन के लिए पहाड़ी के ऊपर पहुंचते हैं. सावन के महीने में न सिर्फ राजधानी रांची बल्कि पूरे झारखंड राज्य के साथ ही साथ बिहार, छत्तीसगढ़, बंगाल, ओडिशा से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. पहाड़ी मंदिर पर भगवान भोलेनाथ के साथ-साथ भगवान के प्रिय नागराज का भी मंदिर है, जहां साक्षात नाग देवता मौजूद हैं. बड़ी संख्या में सांपों की मौजूदगी के बावजूद भगवान के चमत्कार स्वरूप आज तक किसी भी श्रद्धालुओं को किसी भी सांप ने डसा नहीं

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रांची की पहाड़ी पर स्थित है भगवान भोलेनाथ का मंदिर

शोध के मुताबिक, हिमालय से भी पुराना रांची का यह पहाड़ है, जहां भगवान भोलेनाथ का मंदिर स्थित है. वैज्ञानिक शोध के दौरान यह पता चला है कि रांची का यह पहाड़ प्रोटेरोजोइक काल का है, जिसकी आयु लगभग 4,500 मिलियन साल है. हालांकि कुछ भू वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पहाड़ की आयु 980 से 1200 मिलियन वर्ष है. इस पहाड़ के चट्टान का भौगोलिक नाम गानेटिफेरस सिलेमेंनाइट शिष्ट है.

पहाड़ी मंदिर के अगर इतिहास की बात की जाए इस मंदिर का इतिहास काफी रोचक है. साल 1842 में ब्रिटिश नागरिक कर्नल ओन्सले ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था. देश की आजादी से पूर्व यह मंदिर अंग्रेजों के कब्जे में था. अंग्रेज इसी स्थान पर स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटकाया करते थे. ब्रिटिश शासन काल के समय पहाड़ी मंदिर के क्षेत्र को “हैंगिंग गैरी” के नाम से जाना जाता था.

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