Shri Surya Chalisa Lyrics in Hindi | श्री सूर्य चालीसा
सूर्य देव को प्रसन्न करने और कुंडली में सूर्य दोष से मुक्ति के लिए श्री सूर्य चालीसा का पाठ अचूक है। पढ़ें पूरी चालीसा, सूर्य मंत्र और आरती शुद्ध हिंदी में।
Updated Jul 19 2026 04:12 AM
Editor: Panthalassa Team | Location: Deo, Aurangabad (Bihar), Bihar, India
हिंदू धर्म में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जो पूरे जगत के पोषण और ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं, ज्योति शास्त्रों के अनुसार रविवार का दिन भगवान ने सूर्य को समर्पित है। इस दिन भक्ति अगर सच्चे मन से श्री सूर्य चालीसा का पाठ करते हैं तो उनके जीवन में कई चमत्कारी और सकारात्मक बदलाव आते हैं।
॥ दोहा ॥
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अंग। पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग ॥
॥ चौपाई ॥
जय सविता जय जयति दिवाकर! । सहस्त्रांशु! सप्ताश्व तिमिरहर ॥ भानु! पतंग! मरीची! भास्कर! । सविता हंस! सुनूर विभाकर ॥ विवस्वान! आदित्य! विकर्तन । मार्तण्ड हरिरूप विरोचन ॥ अम्बरमणि! खग! रवि कहलाते । वेद हिरण्यगर्भ कह गाते ॥
सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहि-कहि । मुनिगन होत प्रसन्न मोद-लहि ॥ अरुण सदृश सारथी मनोहर । हांकत हय साता चढ़ि रथ पर ॥ मंडल की महिमा अति न्यारी । तेज रूप केरी बलिहारी ॥ उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते । देखि पुरन्दर लज्जित होते ॥
मित्र मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर । सविता सूर्य अर्क खग कलिकर ॥ पूषा रवि आदित्य नाम लै । हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै ॥ द्वादस नाम प्रेम से गावैं । मस्तक बारह बार नवावैं ॥ चार पदारथ जन सो पावै । दुःख दारिद्र अघ वृंद नसावै ॥
नमस्कार को चमत्कार यह । विधि हरिहर को कृपासार यह ॥ सेवै भानु तुमहिं मन लाई । अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई ॥ बारह नाम उच्चारन करते । सहस जनम के पातक टरते ॥ उपाख्यान जो करते तव जन । रिपु सों जय लहते सोतेहि छन ॥
धन सुत सहित परिवार बढ़तु है । प्रबल मोह को फंद कटतु है ॥ अर्क शीश की रक्षा करते । रवि ललाट पर नित्य बिहरते ॥ सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत । कर्ण देस पर दिनकर छाजत ॥ भानु नासिका वास करहु नित । भास्कर करत सदा मुख को हित ॥
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे । रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे ॥ कंठ सुवर्ण रेत की शोभा । तिग्मतेजसः कांधे लोभा ॥ पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर । त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर ॥ युगल हाथ पर रक्षा कारण । भानुमान उरसर्म सुउदरचन ॥
बसत नाभि आदित्य मनोहर । कटि महँ हंस, रहत मन मुदभर ॥ जंघा गोपति सविता बासा । गुप्त दिवाकर करत हुलासा ॥ विवस्वान पद की रखवारी । बाहर बसते नित तम हारी ॥ सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै । रक्षा कवच विचित्र विचारे ॥
अस जोजन अपने मन माहीं । भय जग बीच करहु तेहि नाहीं ॥ दरिद्र कुष्ठ तेहि कबहु न व्यापै । योजन याको मन महँ जापै ॥ अंधकार जग का जो हरता । नव प्रकाश से आनन्द भरता ॥ ग्रह गण ग्रसि न मिटावत जाही । कोटि बार हम प्रनवौं ताही ॥
मंद सदृश सुत जग में जाके । धर्मराज सम अद्भुत बांके ॥ धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा । किया करत सुरमुनि नर सेवा ॥ भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों । दूर हटत सो भवके भ्रम सों ॥ परम धन्य सो नर तनधारी । हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी ॥
अरुण माघ महँ सूर्य फाल्गुन । मधु वेदांग नाम रवि उदयन ॥ भानु उदय बैसाख गिनावै । ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावे ॥ यम भादों आश्विन हिमरेता । कार्तिक होत दिवाकर नेता ॥ अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं । पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं ॥
॥ दोहा ॥
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य । सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहिं सदा कृतकृत्य ॥
॥ मंत्र ॥
ॐ आदित्याय नमः, ॐ घृणि सूर्याय नमः, ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः ॥