Durga Puja 2026: दुर्गा पूजा मनाने की शुरुआत कब हुई? जानिए इसका असली इतिहास
दुर्गा पूजा मनाने की शुरुआत कब हुई और यह त्योहार बड़े पंडाल लगाने तक कैसे पहुंचा? जानिए इसकी परंपरा और धार्मिक इतिहास।
Updated Oct 14 2026 02:05 PM
Editor: Panthalassa Team | Location: West Bengal, India
भारत में दुर्गा पूजा प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस त्योहार को बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम में बड़े ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार के द्वारा लोग माँ दुर्गा की पूजा करते हैं और बहुत लोग माँ दुर्गा की उपासना में 9 दिन का व्रत भी रखते हैं। इसके अलावा लोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ सजाए हुए पंडालों में घूमने और आनंद उठाने जाते हैं।
लेकिन क्या आपने इस विषय पर विचार-विमर्श किया है कि आखिर दुर्गा पूजा मनाने की शुरुआत हुई कब? यह त्योहार का इतिहास बहुत ज्यादा ही पुराना है। यह त्योहार की शुरुआत कब हुई थी इसका कोई भी निश्चित साल नहीं बता पाना नामुमकिन है। अलग-अलग इतिहास के हिसाब से बंगाल में दुर्गा पूजा मनाने की एक बहुत ही पुरानी परंपरा रही है।
क्यों माँ दुर्गा और महिषासुर की कथा से जुड़ा हुआ है यह एक त्योहार?
दुर्गा पूजा का असली महत्व माँ दुर्गा और महिषासुर की कथा से जुड़ा हुआ है। हिंदू मान्यताओं के हिसाब से महिषासुर एक बहुत ही शक्तिशाली असुर था। वह सभी देवताओं और लोगों को बहुत ज्यादा ही परेशान किया करता था। और उसके इस स्वभाव को रोकने के लिए माँ दुर्गा ने उससे युद्ध किया और अंत में उसका वध ही कर दिया।
माँ दुर्गा की महिषासुर से जीत बुराई पर अच्छाई का प्रतीक माना गया है। इसीलिए दुर्गा पूजा के दौरान माँ दुर्गा की ऐसी मूर्तियां बनाई जाती हैं जिसमें हर मूर्ति में वह महिषासुर का वध करती हुई दिखाई देती है।
दुर्गा पूजा से एक दूसरी जुड़ी हुई धार्मिक कथा भगवान राम की भी है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार रावण से युद्ध करने से पहले भगवान राम ने माँ दुर्गा की पूजा की थी। शरद ऋतु में माँ दुर्गा को जगाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है और इसे अकाल बोधन का नाम भी दिया गया है।
पहले में सिर्फ घर और समझदारों के यहाँ ही क्यों होती थी यह पूजा?
आज दुर्गा पूजा के त्योहार के दौरान अलग-अलग इलाकों में तरह-तरह के पंडाल लगाए जाते हैं और माँ दुर्गा की मूर्ति देखने और पंडाल की सजावट देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। पर पहले दुर्गा पूजा इतने बड़े स्तर पर नहीं मनाई जाती थी। पहले के जमाने में दुर्गा पूजा बस घरों और बड़े परिवारों में मनाई जाती थी।
बंगाल में दुर्गा पूजा को एक बहुत ही महत्वपूर्ण भव्य रूप देने का इतिहास बहुत ही पुराना बताया जाता है। बहुत सारे ऐतिहासिक विवरणों में यह बताया जाता है कि कांग्सनारायण ने लगभग 1606 में भव्य दुर्गा पूजा कराई थी। हालांकि दुर्गा पूजा की शुरुआत को लेकर अलग-अलग तरह की ऐतिहासिक जानकारी मिलती है।
पुराने समय में अमीर लोग और ज्यादातर सुखी और संपन्न परिवार दुर्गा पूजा का आयोजन किया करते थे। उस समय पूजा का आयोजन उनके घरों या मोहल्ले में किया जाता था जहाँ वह लोग अपने रिश्तेदारों को निमंत्रण दिया करते थे। धीरे-धीरे इस परंपरा में काफी बदलाव देखने को मिला और हर तरीके के लोग भी दुर्गा पूजा का आयोजन कर दुर्गा पूजा मनाने लगे।
कब शुरू हुई थी पूजा की यह सामूहिक परंपरा?
दुर्गा पूजा के इतिहास में 1790 को बहुत ज्यादा ही खास साल कहा गया है। यह मान्यता है कि इसी साल में पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के गुप्तीपारा में 12 दोस्तों ने एक साथ मिलकर दुर्गा पूजा का आयोजन किया था और यह भी कहा गया है कि दुर्गा पूजा का आयोजन करने के लिए उन्होंने लोगों से चंदा भी इकट्ठा किया था।
इस आयोजन को बारोवारी पूजा भी कहा गया है क्योंकि इसका आयोजन 12 लोगों द्वारा शुरू किया गया था। इस आयोजन को 12 लोगों के मिलकर पूजा को एक शुरुआत देने की परंपरा से जोड़ा जाता है। और इसी तरह दुर्गा पूजा किसी एक परिवार का आयोजन न होकर पूरे समाज का आयोजन बन चुका है।
इसी प्रकार आप लोगों के बीच में भी दुर्गा पूजा की भागीदारी बढ़ने लगी और यह त्योहार बस अब अमीर घरों में नहीं मनाया जाता है। धीरे-धीरे लोग मिलकर बंगाल के अलग-अलग इलाकों और भी दूसरे देशों के अलग-अलग इलाकों में मिलकर दुर्गा पूजा का आयोजन करने लगे हैं।
बड़े पंडाल और इस उत्सव को सार्वजनिक बनाने की शुरुआत किस प्रकार हुई?
बढ़ते समय के साथ दुर्गा पूजा का भी आयोजन बड़ा होने लगा। यह पूजा सिर्फ घरों तक सीमित न रह कर घरों से निकल कर सार्वजनिक स्थान पर पहुंचने में भी सफल रही। 20वीं सदी की शुरुआत में लोग कोलकाता में मिलकर इसका बड़ा आयोजन करने की शुरुआत कर चुके थे। सन 1910 में बागबाजार में हुई सार्वजनिक दुर्गा पूजा को इस इतिहास में बदलाव का एक बहुत ही श्रेष्ठ प्रतीक माना गया है।
और ठीक इसके बाद अलग-अलग इलाकों में भी दुर्गा पूजा समितियां बनने लगीं। बहुत सारे लोग अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार एक साथ जुड़ते हैं, पूजा की तैयारी करते हैं और पूजा मनाते हैं। अगर आज के जमाने में देखा जाए तो आज बड़े-बड़े पंडाल लगते हैं और तरह-तरह की सजावटें भी की जाती हैं, जैसे पंडाल को अलग-अलग विषय पर बनाया जाता है, तरह-तरह की लाइट्स लगाई जाती हैं जो देखने में बहुत ही आकर्षक होती हैं और मन को मोहित करने वाली भी होती हैं।
आज के जमाने में दुर्गा पूजा सिर्फ एक आम पूजा नहीं रही। यह हर तरह के लोगों को एक साथ आने का मौका भी देती है। पंडालों के जरिए अलग-अलग तरह की कलाकृति भी दिखाई जाती है।
क्यों दुर्गा पूजा को मिली UNESCO में भी एक खास पहचान?
दुर्गा पूजा की पहचान पहले की तरह बस भारत तक ही सीमित नहीं रही है। दिसंबर 2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा को UNESCO की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। इस वजह से इस त्योहार को सांस्कृतिक पहचान और काफी महत्व भी मिला।
UNESCO की इस पहचान के द्वारा यह पता चलता है कि दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक पूजा नहीं है बल्कि एक जरूरी सांस्कृतिक परंपरा भी है। इसमें कई तरह के कलाकारों, पूजा समितियों और बहुत सारे लोगों की एक अहम भूमिका होती है। बहुत से लोग इस त्योहार की मदद से अपनी संस्कृति को याद कर इस त्योहार को अपनी आगे की पीढ़ियों तक बढ़ाने का प्रयास करते हैं।
दुर्गा पूजा का इतिहास बहुत सदियों पुराना है। समय के साथ इसे मनाने के तरीके में भी बहुत ज्यादा ही बदलाव देखा जा सकता है। पहले जहां पूजा बड़े घरों और जमींदारों के घरों में होती थी अब वही पूजा घरों के साथ-साथ बड़े-बड़े पंडालों में भी आयोजित की जाती है और इसी तरीके से इस पूजा की एक बड़ी पहचान बन चुकी है।
आज दुर्गा पूजा धर्म और आस्था के साथ-साथ अपनी कला को भी न्योछावर करता है। यह पूजा सिर्फ माँ दुर्गा की पूजा करने के अलावा लोगों को एक साथ इकट्ठा समूह में साथ लेकर आता है और उनके बीच एकता, स्नेह और प्रेम बढ़ाने में काफी मदद करता है। इस पूजा के दौरान लोग अपनी कला और संस्कृतियों को प्रस्तुत करते हैं कि उनकी आगे आने वाली पीढ़ियां भी इसका महत्व समझ सकें।